Wednesday, November 25, 2009

दिन कटता है रात

दिन कटता है रात कटती नहीं,
दिल से तुम्हारी तस्वीर हटती नहीं,
मत पूछो मैं क्यों खो जाता हूं ख्यालों में,
क्योंकि इंतजार की घड़ी कभी घटती नहीं !
पूछता हूं हवाओं से क्या वे तुम्हें छू के आए हैं,
करके स्पर्श तुम्हारा क्या संदेश लाए हैं,
पूछता हूं बादलों से सभी पर नज़र रखते हो,
क्या कभी मेरी प्रेयसी की भी खबर रखते हो,
अबके जाओ यह संदेश प्रियतम को दे देना,
दिन कट जाता है रात कटती नहीं,
इंतजार की घड़ियां बढ़ती हैं, घटती नहीं,
तस्वीर तुम्हारी सज़ा के रखी है दिल पर
कभी दिल से उतरती नहीं !!

Monday, November 9, 2009

जब मुझे नज़र आया मौत का रास्ता,

जब मुझे नज़र आया मौत का रास्ता,
तब सबने मुझे आगे बढ़ने से रोका,
ज़िंदगी की राह में,
मौत ने आकर दी दस्तक,
सबने मौत का दामन थामने से रोका,
खुशियों को छीनकर दुख देने वालों ने हमें,
अपनी मंज़िल के करीब पाकर हमें आगे जाने से रोका,
मौत ही ज़िंदगी की आख़िरी मंज़िल होती है,
यह जानकर भी अनजान बने रहने का हमने सोचा!

मौत की मंज़िल मिली,
जब चले हम उसे अपनाने,
तब हमारे अपनों ने हमारी राह में कांटे बिछाए,
इतनी जल्दी ये मौत की राह पर ना जाए !
हम इन्हें और सताएं,
इनके दुखों को और बढ़ाए,
चैन की मौत क्यों इन्हें नसीब होने पाए!

जब मिला मुझे मौत का रास्ता,
अपनों ने मुझे आगे बढ़ने से रोका ।।

Monday, November 2, 2009

तुम हो जैसे शीतल छाया

तुम हो जैसे शीतल छाया
पर अब धूप ही जीवन अपना,
प्यार जो मैंने तुमसे पाया
अब वो मात्र बना इक सपना।

हो अजगर की हरकत जैसे
यह रिश्ता मन बहलाता है,
अंग को चीरेगा तो फिर भी
खंजर अब यह सहलाता है।

ऋतु में जो सर्दी होवे तो
धूप भी मन को भा जाती है
मगर नहीं वो जीवन देती
सरिता जो तरसा जाती है
तन वो नहीं प्राप्त कर सकता
जिसको मन ने है अपनाया
फिर भी यादों के फूलों पर
तुम हो जैसे शीतल छाया।

तुम जो मेरी बात को सुन लो
तो हर वाक्य, गान हो जाए
पर यह गीत अधर में ठहरा
कौन इसे अब आकर गाए
इस बंजर में वृक्ष लगाना
ऐसा देख रही हो सपना
मैं भी चाहूं छांव में सोना
पर अब धूप ही जीवन अपना

कभी कभी बिन वर्षा के भी
बादल मन ललचाने आते
सब वो नहीं याद रह पाते
गीत जो प्रेमी मिल कर गाते
बिन अस्तित्व का जीवन यह था
बस उलझन में ही मन यह था
जीवन गीत हृदय ने गाया
प्यार जो मैंने तुमसे पाया।

ऐसा प्यार जिसे पा कर ही
सबकुछ हासिल हो जाता है
एक वो ही क्षण तो जीवन है
जिसमें मानव खो जाता है
सब के भाग्य में भी ना होता
दो धड़कन का साथ में चलना
बिल्कुल यूं ही संग था अपना
अब वो मात्र बना इक सपना

मैं तो सब कुछ भूल चुका था
बस पागल हिरन के जैसे
कस्तूरी को ढूंढ रहा था
भाग रहा जीवन से जैसे
पर कब जाग उठी यह ज्वाला
नाच उठा मन उन्मद माए से
जकड़ गया मन डोर में प्रीत की
हो अजगर की हरकत जैसे।

क्या तुम सच को बोल सकोगी
व्याकुल हो अंतर यह बोले
क्या मैं सच को मान सकूंगा बस यह
प्रश्न अनंत टटोले
हर दिन इन बातों से हटकर
मन दुनिया में खो जाता है
जब भी कोई चोट लग जाती
यह रिश्ता मन बहलाता है।

तुमसे यदि विदा भी ले लूं
ना मैं तुम को भूल सकूंगा
तुम हो मुझमें प्राण की भांति
हर पल बस मैं शूल सहूंगा
ऐसे ही इक दिन जीवन में
बिन दस्तक के तुम आ ठहरी
उस दिन ना मैं जान सका था
चोट लगी थी कितनी गहरी
तीर अभी काया में स्थिर ही
कितना भी ना उसको देखूं
अंग तो चीरेगा वो फिर भी

इक दिन सखा मिलन भी होगा
कितना क्रूर हो भाग्या विधाता
मन और मन तो एक हुए हैं
तन और तन का कैसा नाता
पर संसार बड़ा ही निर्दय
कब यह प्रेम समझ पाता है
इक दिन हृदय रक्त पीने को
खंजर अब यह सहलाता है

ये ताल्लुकात, ये रिश्ते

ये ताल्लुकात, ये रिश्ते , ये दोस्ती, ये साथ
ये हमदर्दियां, ये वादे, कांधे पे ऐतबार का हाथ
ये हर बात पे कसमें, ये लम्बी-लम्बी बातें
ये जज्बात, ये तोहफे और बेशकीमती सौगातें
ये खून का वास्ता, ये रिश्ते-नातों का हवाला
ये हमसफ़र, ये हमकदम, ये हमनवां, ये हमप्याला
यकीनन तब तलक हैं जब तक तेरे पास दाने हैं
जिस दिन बिन-दाना हो गया, उस रोज़ से सब बेगाने हैं।।