तुम हो जैसे शीतल छाया
पर अब धूप ही जीवन अपना,
प्यार जो मैंने तुमसे पाया
अब वो मात्र बना इक सपना।
हो अजगर की हरकत जैसे
यह रिश्ता मन बहलाता है,
अंग को चीरेगा तो फिर भी
खंजर अब यह सहलाता है।
ऋतु में जो सर्दी होवे तो
धूप भी मन को भा जाती है
मगर नहीं वो जीवन देती
सरिता जो तरसा जाती है
तन वो नहीं प्राप्त कर सकता
जिसको मन ने है अपनाया
फिर भी यादों के फूलों पर
तुम हो जैसे शीतल छाया।
तुम जो मेरी बात को सुन लो
तो हर वाक्य, गान हो जाए
पर यह गीत अधर में ठहरा
कौन इसे अब आकर गाए
इस बंजर में वृक्ष लगाना
ऐसा देख रही हो सपना
मैं भी चाहूं छांव में सोना
पर अब धूप ही जीवन अपना
कभी कभी बिन वर्षा के भी
बादल मन ललचाने आते
सब वो नहीं याद रह पाते
गीत जो प्रेमी मिल कर गाते
बिन अस्तित्व का जीवन यह था
बस उलझन में ही मन यह था
जीवन गीत हृदय ने गाया
प्यार जो मैंने तुमसे पाया।
ऐसा प्यार जिसे पा कर ही
सबकुछ हासिल हो जाता है
एक वो ही क्षण तो जीवन है
जिसमें मानव खो जाता है
सब के भाग्य में भी ना होता
दो धड़कन का साथ में चलना
बिल्कुल यूं ही संग था अपना
अब वो मात्र बना इक सपना
मैं तो सब कुछ भूल चुका था
बस पागल हिरन के जैसे
कस्तूरी को ढूंढ रहा था
भाग रहा जीवन से जैसे
पर कब जाग उठी यह ज्वाला
नाच उठा मन उन्मद माए से
जकड़ गया मन डोर में प्रीत की
हो अजगर की हरकत जैसे।
क्या तुम सच को बोल सकोगी
व्याकुल हो अंतर यह बोले
क्या मैं सच को मान सकूंगा बस यह
प्रश्न अनंत टटोले
हर दिन इन बातों से हटकर
मन दुनिया में खो जाता है
जब भी कोई चोट लग जाती
यह रिश्ता मन बहलाता है।
तुमसे यदि विदा भी ले लूं
ना मैं तुम को भूल सकूंगा
तुम हो मुझमें प्राण की भांति
हर पल बस मैं शूल सहूंगा
ऐसे ही इक दिन जीवन में
बिन दस्तक के तुम आ ठहरी
उस दिन ना मैं जान सका था
चोट लगी थी कितनी गहरी
तीर अभी काया में स्थिर ही
कितना भी ना उसको देखूं
अंग तो चीरेगा वो फिर भी
इक दिन सखा मिलन भी होगा
कितना क्रूर हो भाग्या विधाता
मन और मन तो एक हुए हैं
तन और तन का कैसा नाता
पर संसार बड़ा ही निर्दय
कब यह प्रेम समझ पाता है
इक दिन हृदय रक्त पीने को
खंजर अब यह सहलाता है
Monday, November 2, 2009
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