कभी धूप कभी छांव में ज़िंदगी बिता रहा हूं
शा
पर अब मां की गोद में कुछ पल बिताना चाहता हूं
कायर नहीं पर इंसान ही हूं मैं
बस कुछ पल सुकून के बिताना चाहता हूं
कुछ पाने की जुनून में चला जा रहा हूं
इस कुछ का अंत जाने बिना जिये जा रहा हूं
शायद पाने का जज़्बा ही हमें इंसान बनता है
पर अब ढलती शाम का लुत्फ उठना चाहता हूं
निराश नहीं पर इंसान ही हूं मैं
बस कुछ पल सुकून के बिताना चाहता हूं
बचपन किताबों में बिता चला हूं
जवानी काम में उलझा रहा हूं
शायद यही समय हमारी ज़िंदगी संवारता है
पर अब दोस्तों के साथ बारिश में घूमना चाहता हूं
बेबस नहीं पर इंसान ही हूं मैं
बस कुछ पल सुकून के बिताना चाहता हूं
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