मैं कौन हूं
खुद को नहीं पहचान पा रही,
दुनियादारी के चक्कर में
अपनी पहचान को भुला रही !
कभी लगे इंसान हूं,
कभी लगे जानवर का प्रतिरूप,
पहचान मेरी गुम होती जा रही,
जब से मैं स्वार्थी बनती जा रही !
कभी लगे मैं हूं हवा का झोंका,
इंसान की इंसानियत पर खुद को रोते हुए मैंने देखा !
कभी लगे में जीवन की प्यास हूं,
प्यासे जीवन की तलाश हूं!
रेगिस्तान की रेत हूं,
ज़िंदगी क़ी तलाश में आग हूं !
धरती में मिल जाने को
अपनी नकली पहचान मिटाने की
कोशिश में लगी हूं !
अपनी असली पहचान की तलाश हूं!
ज़िंदगी क़ी लड़ाई में,
झूठी दुनिया को मिटाने में,
सच्चाई की राह दिखाने में,
एक पत्थर सिर्फ़ पत्थर बन कर रह गई हूं
Tuesday, September 8, 2009
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