Monday, September 14, 2009

जब आता है सा वन बरसता है पानी

जब आता है सा वन बरसता है पानी
मुझे याद आती है वो माटी की खुश्बू

वो बारिश के पानी से आंगन का भरना
उसी मे छड़पना कि जैसे नदी हो

कभी गलियों में जाकर कीचड़ में घुलटना
कभी छत में आकर मचलना उछलना

वो नाली में बारिश के पानी का बहाव
उसमें बहाता मैं अपनी कागज की नाव

उसपे चींटे को चढ़ा कर मैं माझी समझता
अगर डूब जाता तो झट दूजी नाव बनाता

उन अंधेरी रातों मे छत पे बारिश की टिप टिप
और वो मां का किस्सा
बड़ा ही खूबसूरत है वो मेरे जीवन का हिस्सा

अब बस यही चाह मेरी फिर से लौट आए बचपन
वही मां का आंचल वही घर का आंगन

जब आता है सावन बरसता है पानी
मुझे याद आती है वो माटी की खुश्बू

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