जब आता है सा वन बरसता है पानी
मुझे याद आती है वो माटी की खुश्बू
वो बारिश के पानी से आंगन का भरना
उसी मे छड़पना कि जैसे नदी हो
कभी गलियों में जाकर कीचड़ में घुलटना
कभी छत में आकर मचलना उछलना
वो नाली में बारिश के पानी का बहाव
उसमें बहाता मैं अपनी कागज की नाव
उसपे चींटे को चढ़ा कर मैं माझी समझता
अगर डूब जाता तो झट दूजी नाव बनाता
उन अंधेरी रातों मे छत पे बारिश की टिप टिप
और वो मां का किस्सा
बड़ा ही खूबसूरत है वो मेरे जीवन का हिस्सा
अब बस यही चाह मेरी फिर से लौट आए बचपन
वही मां का आंचल वही घर का आंगन
जब आता है सावन बरसता है पानी
मुझे याद आती है वो माटी की खुश्बू
Monday, September 14, 2009
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