दिल की नादानियां क्या समझ लीजिए
घड़ी भर की मुलाकात और मचल लीजिए
राहें हैं मुश्किल ये माना हमने
इस ख़ौफ़ से क्या, मंज़िल बदल लीजिए
इश्क़ में बर्बाद मुक़र्रर था होना
होश हो तब तो, खुद को सम्भल लीजिए
जब आ ही गए तो दीदार-ए-सनम हो के रहेगा
यार की गली से क्या यूं ही निकल लीजिए
बने हैं रकीब नासेह मुहब्बत की राह में
या रब अब क्या उनकी भी दखल लीजिए
Thursday, January 14, 2010
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