बौना हूं मैं, कोई खिलौना नहीं
चलता हूं जब भी मैं सड़कों पे, तो नज़रें खुद-ब-खुद झुक जाती हैं,
जब उठती है, तो देखता हूं कि इंसान की नज़रें किस तरह से सताती हैं,
भूल जाते हैं वो कि
बौना हूं मैं, कोई खिलौना नहीं !
हंसते हैं वे मुझपे, जैसे मैं कोई एक नुमाइश हूं ,
याद दिलाओ उन्हें, कि मैं भी खुदा की पैदाइश हूं,
कभी नाटा-नाटा,तो कभी बौना-बौना कह कर चिढ़ाते हैं,
भूल जाते हैं वो कि
बौना हूं मैं, कोई खिलौना नहीं !!
शुक्र है, क्योंकि इस नाम पर ही तो मैं अपनी ज़िन्दगी बिताता हूं ,
हंसाता हूं उन्हें सर्कस में और बौना-बौना कहलाता हूं ,
दो वक़्त की रोटी मिल जाती है, पर ज़िन्दगी तड़पाती है
फ़रियाद करता हूं, खुदा से और बोलता हूं उस इंसान से
कि क्यों भूल जाता है तू
बौना हूं मैं कोई खिलौना नहीं !!
Thursday, January 14, 2010
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