खिले फूल सी सुन्दर सी तुम
रात चांदनी चंदा सी तुम
शीतल पवन चली हो वैसी
शुद्ध सीप में मोती जैसी
कंचन तन से चंचल मन की
किसी ताल में खिले कमल सी
मनमोहक है वाणी उसकी
ठान लिया जो मन में करती
कांटे हों या फिसलन पथ पर
नहीं रुकी है नहीं रुकेगी
आन बान व शान से जीना
जीवन पथ पर सरपट चलती
वही तुम्हीं हो वही तुम्हीं थी
Thursday, January 14, 2010
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