Tuesday, August 18, 2009

उस रोज़ मेरे नगमों का अंदाज देखना

जिस रोज़ हर पेट को रोटी मिल जाएगी
जिस रोज़ हर चेहरा हंसता नज़र आएगा
जिस रोज़ नंगे बदन कपड़ों से ढके होंगे
जिस रोज़ खुशियों में वतन डूब जाएगा
उस रोज़ मेरे नगमों का अंदाज़ देखना
मेरी आवाज़ में एक नई आवाज़ देखना ।।

जिस रोज़ किसानों के भरे खलिहान होंगे
और रोज़गारशुदा वतन के नौजवान होंगे
जिस रोज़ पसीने की सही कीमत मिलेगी
इन महलों से बड़े जिस रोज़ इन्सान होंगे
उस रोज़ मेरे नगमों का अंदाज़ देखना
मेरी आवाज़ में एक नई आवाज़ देखना ।।

जिस रोज़ राह में कोई अबला न लुटेगी
जिस रोज़ दौलत से कोई जान न मिटेगी
जिस रोज़ यहां जिस्म के बाज़ार न लगेंगे
जिस रोज़ डोली दर से कोई सूनी न उठेगी
उस रोज़ मेरे नग्मों का अंदाज़ देखना
मेरी आवाज़ में एक नई आवाज़ देखना ।।

ये हाथ पसारे मासूम बचपन हजारों
जिस रोज़ मुझे राह में घूमते न दिखेंगे
जिस रोज़ ज़र्द, पिचके वीरान चेहरों पे
भूख के नाचते-गाते बादल न दिखेंगे
उस रोज़ मेरे नग्मों का अंदाज़ देखना ।।

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