Monday, August 3, 2009

गिले शिकवे पर आंसू बहते रहे

मैं कहता रहा वो सुनते रहे
गिले शिकवे पर आंसू बहते रहे
नाव चलती रही दरिया बहती रही
हवा चलती रही सनसनाती रही

दूर कहीं दूसरी नाव पर
मांझी विरह गीत गाता रहा
यादों का झरना बहता रहा
पवन वेग से था चलता रहा

खामोश पेड़ों की डालियों पर
चकवा चकवी को मनाता रहा
दोनों किनारे नदी घाट पर
मृगों की टोली वहां पर खड़ा

हमारे मिलन की इस घड़ी पर
चक्षुओं से मोती गिराते रहे
हर शब्द पर होश खोते रहे
मैं कहता रहा वो सुनते रहे

गिले शिकवे पर आंसू बहते रहे
कीमती आंसुओं को बस पीते रहे
नहीं होश था कुछ तन और बदन का
फूलों से पंखुड़ी भी गिरते रहे

हर ओर माहौल गमगीन था
पर नज़ारा कुदरत का रंगीन था
कल-कल करती हुई एक दरिया
अपने ही पथ पर तल्लीन था

हमारी दशा देख एक बादल का टुकड़ा
लहराते हुए आया सीधे ज़मीन पर
ढंका उसने दोनों को आंचल से अपने
स्नेह की बूंदे हम पर गिरा कर

बादल के आंचल में लिपटे हुए हम
परी लोक में थे विचरते रहे
मैं कहता रहा वे सुनते रहे
गिले शिकवे पर आंसू बहते रहे।

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