दूर रह सके जो हम से , दम कहां मंज़िल में है ?
झुका दे जो आसमां , हौसला वो दिल में है
दूर रह सके जो हमसे , दम कहां मंज़िल में है...
विश्वास से उठे जो कदम , चट्टानों पर निशान छोड़ जाएंगे
रोक सके जो हमें , दम कहां तूफ़ानों में है
दूर रह सके जो हम से , दम कहां मंजिल में है...
ए मां तेरे दूध की स्याही से वक़्त के चहरे पे वो दास्तान लिख जाएंगे
भुला सके जिसे ये जहां , दम कहां जमाने में है
दूर रह सके जो हम से दम कहां मंजिल में है ...
जो करने इस जहां में आए थे वो करके ही जाएंगे
बदल सके जो हमारे इरादे दम कहां किस्मत में है
दूर रह सके जो हम से दम कहां मंज़िल में है...
एक दिन धरती की गोद में सिर रख कर सो जाएंगे
जगा सके जो फिर हमें वो दर्दे पुकार कहां तेरी चाहत में है
दूर रह सके जो हम से दम कहाँ मंज़िल में है ...
Tuesday, August 18, 2009
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